गरियाबंद: यूटीआर के अंतर्गत आने वाले 17 गांवों के वनवासियों ने अंतिम बचे नर वन भैंस की आबादी के संरक्षण और संवर्धन के लिए कदम आगे बढ़ाया

गिरिश गुप्ता गरियाबंद:- सामुदायिक वन संसाधन अधिकार क्षेत्रो में समुदायों ने वन विभाग के साथ मिलकर वन अग्नि और अवैध कटाई को कम करने के उपायों से लेकर वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक रहवास बनाने हेतु अतिक्रमण की गई वन भूमि को स्वेच्छा से छोड़ने तक, समुदायों ने यूटीआर प्रशासन को शांतिपूर्ण मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता की है। 14 दिसंबर, 2025 को यूएसटीआर प्रशासन ने उदंती कोर के 17 गांवों के 57 प्रतिनिधियों के साथ बैठक की, जिनमें श्री अर्जुन नायक (पूर्व-सरपंच नागेश), श्री रूप सिंह मरकाम (पूर्व-सरपंच साहेबिन), श्री बेनीपुरी गोस्वामी (एनजीओ खोज), श्री किरण नागेश (ग्राम कार्लाझार), श्री त्रिपुरा नेताम, श्री बलमत सिंह (बम्हनीझोला), श्री शामिल थे। पुस्तम सिंह मांझी (देवझारमली), श्री नरहरि सोरी, श्री भोला सिंह नेताम (बंजारी बहारा), श्री फूल सिंह (कोदोमाली), श्री कैलाश मरकाम (कोयबा), श्री दीपक मंडावी (कोयबा), श्री भानुप्रताप सिन्हा (जांगड़ा), श्री बैजनाथ नेताम, कुमारी बरखा (एनजीओ – खोज) ने यूएसटीआर में शुद्ध वन भैंसों की आबादी को संरक्षित करने और बढ़ाने में सहमति जताई है। सामुदायिक भागीदारी राज्य पशु के संरक्षण में मदद करेगी और छत्तीसगढ़ को वन भैंसा राज्य (wild buffalo state) बनाने में सहायक होगी, ठीक उसी प्रकार जैसे मध्य प्रदेश को बाघों और चीतों के संरक्षण, गुजरात को शेरों के संरक्षण और असम को गैंडों के संरक्षण के लिए जाना जाता है।असम की तीन मादा वन भैंसों (जो बरनावापारा वन्यजीव अभयारण्य में रखी गई हैं) को उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व में स्थानांतरित करने और उन्हें एकमात्र जीवित वन भैंसा “छोटू” के साथ वन क्षेत्र में प्रजनन एवं स्वतंत्र विचरण हेतु छोड़ने की तैयारी चल रही है। वन भैंसों का संरक्षण भारतीय वन्यजीव संस्थान, राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और छत्तीसगढ़ वन विभाग की देखरेख में किया जाएगा।खोज एवं जन जागृति और अर्थ ब्रिगेड फाउंडेशन जैसे गैर-सरकारी संगठन इस संरक्षण परियोजना में उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व का सहयोग करेंगे।
मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, उदंती सीतानादी बाघ अभ्यारण्य के उदंती (कोर) क्षेत्र में स्थित 17 ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों ने राज्य पशु जंगली भैंस की आबादी के संरक्षण
और संवर्धन के लिए आगे कदम बढ़ाया है। एक समय वन भैंसे महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में व्यापक रूप से पाई जाती थी, लेकिन अब पूरे मध्य भारतीय भूभाग (Central Indian
Landscape) में वन भैंस की उपस्थिति वाला एकमात्र संरक्षित क्षेत्र उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व है।
जंगली भैंसों की घटती आबादी को देखते हुए, छत्तीसगढ़ वन विभाग ने उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व, बरनावापारा अभ्यारण्य और पशु चिकित्सकों की संयुक्त टीम की सहायता से वर्ष 2020 और 2023 मेंजंगली भैंसों की घटती आबादी को देखते हुए, छत्तीसगढ़ वन विभाग ने उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व, बरनावापारा अभ्यारण्य और पशु चिकित्सकों की संयुक्त टीम की सहायता से वर्ष 2020 और 2023 में दो चरणों में असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से 5 मादा और 1 नर वन भैंस को बरनावापारा वन्यजीव अभ्यारण्य में सफलतापूर्वक स्थानांतरित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। तत्समय यूएसटीआर के अति-नक्सली प्रभावित होने के कारण वन भैंसों को बारनावापारा अभ्यारण्य में रखा गया था। बरनावापारा में असम की वन भैंसों की आबादी पिछले 2 वर्षों में 5 बछड़ों के जन्म के साथ बढ़कर 11 हो गई है।
असम से लाये गये वन भैंसों में अंतर्प्रजनन (In-breeding) को रोकने और मध्य-भारतीय वन भैंसों के जीन पूल के संरक्षण के लिए बरनावापारा से 3 मादा वन भैंसों को यूएसटीआर में स्थानांतरित करने की योजना बनाई जा रही है। इस प्रकार गठित 4 वन भैंसों के छोटे दल को 45 दिनों की अनिवार्य क्वारंटाइन अवधि और रेडियो कॉलर लगाने के बाद प्राकृतिक रहवास में छोड़ दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ से प्रेरणा लेकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश ने भी वन भैंसों की आबादी बढ़ाने की योजना बनाई है। हाल ही में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की टीमों ने यूएसटीआर के वन भैंसा रहवास और सॉफ्ट रिलीज़ एन्क्लोजर का दौरा किया है।
वन भैंसों का पारिस्थितिक महत्व
विशाल शाकाहारी भूमिका (Mega Herbivore): वन भैंसें इस क्षेत्र के सबसे बड़े चरने वाले जानवरों में से हैं। उनकी चरने की आदतें घास के मैदानों को काष्ठमय पौधों से भरने से रोकती हैं, जिससे विविध प्रजातियों को सहारा देने वाले खुले पारिस्थितिक तंत्र बने रहते हैं।
पारिस्थितिक तंत्र अनुक्रमण चरने और रौंदने से वे पौधों के पुनर्जनन चक्रों को प्रभावित करते हैं, जिससे घास और झाड़ियों का एक ऐसा मिश्रण बना रहता है जो हिरण और मृग जैसे अन्य शाकाहारी जानवरों के लिए लाभकारी होता है।
जल पारिस्थितिक तंत्र से संबंध जल पर निर्भर जानवर होने के नाते, वे आर्द्रभूमि और नदी तटवर्ती पारिस्थितिक तंत्रों को आकार देने में योगदान देते हैं। उनके कीचड़ में लोटने से उभयचरों और जलीय पौधों के लिए सूक्ष्म पर्यावास बनते हैं।
जंगली भैंसों के स्वागत के लिए टाइगर रिज़र्व की तैयारियां
वन भैंसा पर्यावास विकास कार्य किए गए हैं घास के मैदान, खरपतवार नियंत्रण अभियान, वृक्षारोपण, सौर ऊर्जा से चलने वाले जल स्रोत। वन्यजीवों के लिए संरक्षित क्षेत्र बनाने हेतु वन्यजीव गलियारों में 750 हेक्टेयर अतिक्रमण हटाना और अवैध शिकार विरोधी अभियान चलाना जैसे संरक्षण कार्य किए जा रहे हैं।

मानव-वन भैंसा संघर्ष को रोकने के लिए हाथी अलर्ट ऐप को वन भैंसों के विचरण के सम्बन्ध में चेतावनी के लिए अनुकूलित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, वन भैंसों पर नज़र रखने के लिए वन भैसा मित्र दल (पैदल गश्ती दल) तैनात किए जाएंगे।

USTR फसल हानि और पशुधन हानि के दावों के भुगतान की प्रक्रिया को गति देने के लिए एक ऑनलाइन मुआवजा पोर्टल तैयार कर रहा है। पोर्टल के चालू होने के बाद दावों का निपटान 30 दिनों के भीतर किया जाएगा।

जब तक वन-भैंसों की आबादी स्थिर नहीं हो जाती, तब तक इकोटूरिज्म के काम समानांतर रूप से चलते रहेंगे, जिनमें मालाबार पाइड हॉर्नबिल, विशाल गिलहरी, गौर, बार्किंग डियर, तेंदुए, स्लॉथ बियर आदि जैसी अन्य दुर्लभ प्रजातियों पर इको-पर्यटन कार्यों को केंद्रित किया जाएगा। इको-पर्यटन से वन-आश्रितों / ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसरों में विविधता आएगी एवं वनों की सुरक्षा भी बढ़ेगी।
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