मजेदार यात्रा वृतांत – जब दूल्हे के पास शादी मंडप मे जाने के सिवाय कोई चारा नजर नहीं रहा

Dr. Chandrakant wagh

कल मैंने अपने अभिन्न मित्र अनुराग मिश्रा की यात्रा की एक अच्छी पोस्ट पढी फिर मुझे भी अपने एक अविस्मरणीय यात्रा के रोचक वृतांत की याद आ गई । आज से एक साल पहले मै पूना से रायपुर पूणे कुर्ला से लौट रहा था। सबरे दस बजे यह ट्रेन अपने निर्धारित समय पर ही शुरू ही हुई। पूणे से लोणावला खंडाला की खूबसूरत पहाडियों से होती हुई निकल रही थी । जिस दृश्य को भी कैद करने की इच्छा होती थी तब तक ट्रेन आगे निकल जाती थी । बरसात के दिनों में तो यह यात्रा का आनंद ही कुछ और होता है। चलो पुनः विषय पर आया जाये सेकंड एसी मे भीड़ कम और सीट भी खाली थी कि आगे लोगों का रिजर्वेशन था । बस कब यह सफर आगे बढा कि पता नहीं चला और कल्याण आ गया। बडा स्टेशन इस लिए गाडी भी दस मिनट रूकती है। बोगी मे चढने की आपाधापी हमारे आसपास की खाली सीटो के भी यात्री भी आ गए । बस शुरुआत की अपनी प्रोसेस सामान जमाने के बाद थोडा लोग रिलेक्स हुए। फिर आधे घंटे बाद इन्ही सह यात्रियों से मिलने एक बंदा पहुंचा। थोड़ा असहज चिंता उसके चेहरे मे झलक रही थी। एक दूसरे से हाय हलो के बाद यह चारो लोग युवा थे इसमे वह युवा जो इन लोगों से मिलने आया था जिसकी सीट बाजू वाले ही बोगी मे थी । कुछ ही देर मे हम दूसरे यात्रियों को समझने मे देर नहीं लगी कि यह पांच छहों घनिष्ट मित्र है । फिर उसने कहा कि ” यार यह बताओं मै ठीक तो कर रहा हू न ” सच सच बताना । उसमे से एक यार बिलकुल ठीक कर रहा है । नहीं यार उसका फोन आया था कि अभी भी देर नहीं हुई है। उसके मां का फोन आया था कि तुम अपने निर्णय मे एकबार फिर सोच लो कहीं बाद में जिंदगी भर पछताना न पडे । तुम दोनों ने बहुत समय बिताया है बहुत तुम लोग एक साथ घूमे हो। एक दूसरे के नजदीक हो । हम लोगों को पूरी तरह से सुनाई दे रहा था । असली मे जो लडका सबसे यह प्रश्न कर रहा था वो दूल्हा था और बाकी लोग बाराती थे जो विवाह में शामिल होने जा रहे थे । कल्याण से हावड़ा के आगे तक बारात जा रही थी। पर लडका अभी भी इस कशमकश में था कि यह शादी करू की नहीं। कि पुनः लौटकर जिससे प्रेम था उससे शादी करे । कुल मिलाकर वो दो नावों मे सवार था । पर ट्रेन अपनी गति से बढ रही थी । फिर इन दोस्तो के बीच शायद लडके की बहन भी समझाने के हिसाब से अपनी सीट छोडकर आ चुकी थी। फिर नये सिरे से बात चालू हुई कहने लगी कि हम कब से समझा रहे हैं अब उसे भूल जाना चाहिए। वो इसके लायक नहीं है। अभी वाली लडकी अच्छा घर समहालेगी । इस बीच उस कूपे मे मेरे अलावा एक मेल ट्रेन के डरायवहर भी थे । करीब अठावन साल के रहे होंगे। बात रोचक थी और संवेदनशील भी थी । पर इनकी बातो को सुनने से सफर पता नहीं चल रहा था । उस चर्चा मे वो भी अपनी कानूनी सलाह के साथ चर्चा में शामिल हो गये । अब तो यह लगने लगा कि driver साहब भी कहीं इन्ही के साथ तो नहीं है। साहब ने अपनी बात चालू कि और कहा कि तुम्हारा पिछले क्या है अब वो बात गई । अब तुमने जहां शादी के लिए हामी भरी है उससे ही आपको शादी करनी पड़ेगी। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आप पर धोखा धडी का आरोप लग जायेंगा। शायद सामने वाले नाराज होकर डावरी का भी आरोप लगा देंगे। साहब ने उसके लिए जो धाराये लगती है उसे भी बताया। इससे आपकी सर्विस तो जाएगी ही बाद में भी सर्विस लगना मुश्किल हो जाएगी। वहीं पूरे परिवार को जेल भी जाना पड सकता है। वहीं लडकी वालो ने जो शादी के नाम से खर्च किया उसका भी हर्जाना देना पडेगा। थोड़ी सी शिकन दिख रही थी । शायद सात बजे तक भुसावल आया साहब का गंतव्य आने पर वो बधाई देकर उतर गये । पर समस्या पर विचार मे भी काफी कमी आ गई थी। ऐसा लग रहा था कि बंदा के पास विकल्प खत्म हो गये थे। शादी मंडप मे जाने के सिवाय कोई चारा नजर नहीं रहा था । दूसरी तरफ़ प्रेमिका के फोन फिर से एक बार विचार करने की गुजारिश उसके मां का भी फोन कि इतने समय तक साथ रहे इस तरह छोडना अन्याय है । रात हो गई लोग सो रहे थे मेरी भी मंजिल रायपुर सबेरे सबेरे आ गया। मै भी उतर गया पर बारात आगे की तरफ जा रही थी जो दूसरे दिन सबेरे शायद चार पांच बजे पहुंचने वाली थी । लडके के घर वालों ने तो मन बना लिया था । पर अब लगने लगा कि आखिर उसने भी अपनी मंजिल का निर्णय कर लिया था जो बस बीच रास्ते में था । शादी तो पक्की हुई होगी पर अभी भी जानने की इच्छा है कि कहीं मन तो नहीं बदल गया। मेरी यात्रा मे यह यात्रा अब तक की सबसे रोमांचक यात्रा थी । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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