छत्तीसगढ़ के 26 साल: कितना बदला अपना राज्य? विकास की चमक के बीच आज भी अधूरे हैं कई सपने, क्या खोया और क्या पाया?


विशेष विश्लेषण | CGTOP36

रायपुर। 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ ने एक नए राज्य के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी। अलग राज्य बनाने के पीछे केवल प्रशासनिक सीमाओं का बंटवारा नहीं था, बल्कि यहां के लोगों की अपनी पहचान, संस्कृति, संसाधनों पर अधिकार और बेहतर विकास की उम्मीदें भी थीं। उस समय जनता ने सपना देखा था कि छत्तीसगढ़ का पैसा छत्तीसगढ़ के विकास पर खर्च होगा, यहां के युवाओं को रोजगार मिलेगा, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा और आदिवासी अंचलों तक विकास की रोशनी पहुंचेगी।

आज 1 नवंबर 2026 को छत्तीसगढ़ अपनी स्थापना के 26 वर्ष पूरे कर चुका है। इन 26 वर्षों में राज्य ने कई क्षेत्रों में लंबा सफर तय किया है। राजधानी रायपुर का विस्तार हुआ, नए जिले बने, सड़कें और बिजली की सुविधाएं बढ़ीं, औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हुआ और कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी रही।

लेकिन इस विकास यात्रा का दूसरा पहलू भी है। बस्तर और सरगुजा के दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोगों की जिंदगी में अपेक्षित बदलाव आया या नहीं? क्या खनिज संपदा का लाभ स्थानीय आबादी तक पहुंचा? क्या राज्य के युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिला? और क्या स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधाएं उस स्तर तक पहुंच पाईं, जिसकी कल्पना अलग राज्य बनने के समय की गई थी?

26 साल बाद इन सवालों का विश्लेषण जरूरी है।

1. पहचान मिली, प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ

छत्तीसगढ़ बनने के बाद सबसे बड़ा बदलाव राज्य की अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक पहचान का निर्माण रहा। वर्ष 2000 में राज्य की स्थापना के समय यहां 16 जिले थे। आज जिलों की संख्या बढ़कर 33 हो चुकी है।

नए जिलों और प्रशासनिक इकाइयों के गठन का उद्देश्य शासन को आम लोगों के करीब पहुंचाना था। इससे कई क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ी है। स्थानीय स्तर पर कलेक्टर कार्यालय, पुलिस प्रशासन और अन्य सरकारी सुविधाओं का विस्तार हुआ है।

हालांकि केवल जिले बना देना विकास की गारंटी नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या नए जिलों में पर्याप्त डॉक्टर, शिक्षक, अधिकारी, अस्पताल और रोजगार के अवसर भी पहुंचे हैं?

प्रशासनिक विकेंद्रीकरण के साथ सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार अभी भी बड़ी चुनौती है।

2. अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, लेकिन खनिज संपदा का लाभ किसे मिला?

छत्तीसगढ़ को देश के खनिज संपन्न राज्यों में गिना जाता है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और चूना पत्थर जैसे संसाधनों ने राज्य को औद्योगिक पहचान दी है।

भिलाई इस्पात संयंत्र, कोरबा का बिजली उत्पादन क्षेत्र, रायगढ़ और जांजगीर-चांपा के औद्योगिक क्षेत्र राज्य की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

पिछले वर्षों में राज्य ने औद्योगिक निवेश आकर्षित करने के लिए भी प्रयास किए हैं।

2024-25 में छत्तीसगढ़ की आर्थिक विकास दर 10.9 प्रतिशत दर्ज की गई थी। यह उस वर्ष की राष्ट्रीय विकास दर 6.5 प्रतिशत से अधिक थी। हालांकि आर्थिक विकास दर बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि इसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचा है।

हाल ही में राज्य में निवेश प्रस्तावों को लेकर भी बड़ी गतिविधियां सामने आई हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों से संबंधित 290 परियोजनाएं सामने आईं। इनमें से लगभग 175 परियोजनाओं पर क्रियान्वयन शुरू होने की जानकारी दी गई।

लेकिन निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में अंतर होता है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब ये परियोजनाएं जमीन पर उतरेंगी और स्थानीय युवाओं को रोजगार देंगी।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा से होने वाली कमाई का कितना हिस्सा उन गांवों और परिवारों तक पहुंच रहा है, जिनकी जमीन और पर्यावरण इस औद्योगिक विकास की कीमत चुका रहे हैं?

3. किसान और धान: छत्तीसगढ़ की पहचान बनी रही

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है।

समर्थन मूल्य पर धान खरीदी, किसानों को आर्थिक सहायता और कृषि से जुड़ी विभिन्न योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है।

लेकिन किसानों की समस्याएं केवल धान खरीदी तक सीमित नहीं हैं।

सिंचाई की कमी, मौसम की अनिश्चितता, खाद और कृषि लागत में वृद्धि, फसल विविधीकरण की चुनौती और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण की सीमित सुविधाएं आज भी बड़े मुद्दे हैं।

राज्य को अब धान उत्पादन के साथ-साथ दलहन, तिलहन, बागवानी, मछली पालन और खाद्य प्रसंस्करण पर भी ध्यान देना होगा।

किसान केवल सरकारी खरीदी पर निर्भर न रहें, बल्कि उनकी उपज के लिए स्थायी बाजार और बेहतर मूल्य की व्यवस्था बने, यह आने वाले वर्षों की बड़ी जरूरत है।

4. शिक्षा में विस्तार, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब भी चुनौती

26 वर्षों में छत्तीसगढ़ में स्कूलों, कॉलेजों और तकनीकी शिक्षा संस्थानों का विस्तार हुआ है। उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े हैं और ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा की पहुंच बेहतर हुई है।

लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और ग्रामीण-शहरी शिक्षा के अंतर जैसे मुद्दे अब भी महत्वपूर्ण हैं।

बस्तर, सरगुजा और अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना आज भी आसान नहीं है।

एक तरफ रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर में निजी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार हुआ है, दूसरी तरफ कई दूरस्थ इलाकों में बच्चों को बेहतर शिक्षण सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

शिक्षा का वास्तविक मूल्यांकन केवल स्कूलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वहां से पढ़कर निकलने वाले बच्चों को कितने अवसर मिल रहे हैं।

5. स्वास्थ्य सेवाएं: सबसे बड़ी चिंता ग्रामीण और आदिवासी इलाके

राज्य ने स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार में भी काम किया है। मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का नेटवर्क बढ़ा है।

लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता के बीच अभी भी अंतर दिखाई देता है।

विशेषकर बस्तर, अबूझमाड़ और सरगुजा के दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों तक पहुंचने में कठिनाई, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और कुपोषण जैसी समस्याएं महत्वपूर्ण हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में पांच वर्ष से कम उम्र के आदिवासी बच्चों में बौनापन (Stunting) का अनुपात 38.4 प्रतिशत था, जबकि राज्य की कुल आबादी के बच्चों में यह 34.6 प्रतिशत था।

यह आंकड़ा बताता है कि आदिवासी क्षेत्रों में पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर अभी भी विशेष प्रयासों की जरूरत है। ध्यान रहे, ये सर्वेक्षण के आंकड़े हैं, 2026 की वर्तमान स्थिति नहीं।

6. आदिवासी समाज: विकास और विस्थापन के बीच संघर्ष

छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक संपदा से है।

राज्य की लगभग एक-तिहाई आबादी अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित है। बस्तर, सरगुजा और अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास की अपनी अलग चुनौतियां हैं।

पिछले 26 वर्षों में इन इलाकों में सड़क, बिजली, शिक्षा और संचार सुविधाओं का विस्तार हुआ है।

माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के प्रयास भी हुए हैं।

लेकिन इसके साथ ही जमीन, जंगल और जल संसाधनों पर अधिकार, विस्थापन, वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन और स्थानीय समुदायों की सहमति जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।

खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से राज्य को राजस्व मिलता है, लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार, पुनर्वास और विकास का उचित लाभ मिलना भी उतना ही जरूरी है।

विकास का मतलब केवल सड़क और उद्योग नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और अधिकारों की सुरक्षा भी है।

7. गरीबी कम हुई, लेकिन आर्थिक असमानता बाकी

नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 2015-16 के 29.90 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 16.37 प्रतिशत रह गया।

यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

इसका अर्थ है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी कई बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है।

लेकिन गरीबी का कम होना और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना अलग-अलग बातें हैं।

राज्य के कई ग्रामीण परिवार आज भी कृषि मजदूरी, छोटे-मोटे रोजगार और सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। स्थायी रोजगार और नियमित आय के अवसर बढ़ाना अभी भी बड़ी जरूरत है।

8. बढ़ता बजट और कर्ज: विकास के साथ वित्तीय जिम्मेदारी भी जरूरी

छत्तीसगढ़ का बजट भी राज्य की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों को दर्शाता है।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 7.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक अनुमानित किया गया है। वहीं, कर्ज चुकाने के अतिरिक्त कुल व्यय 1.72 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

PRS Legislative Research के बजट विश्लेषण के अनुसार, 2026-27 में राजकोषीय घाटा GSDP का 4.1 प्रतिशत अनुमानित है। वहीं, राज्य की बकाया देनदारियां GSDP के 21.4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

इसका मतलब है कि सरकार के सामने विकास योजनाओं पर खर्च करने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की भी जिम्मेदारी है।

9. छत्तीसगढ़ ने क्या पाया और क्या खोया?

26 वर्षों की यात्रा को देखें तो छत्तीसगढ़ ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं।

राज्य ने पाया:

  • अपनी अलग राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान।
  • औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार।
  • सड़क, बिजली और संचार सुविधाओं में सुधार।
  • कृषि और धान खरीदी की मजबूत व्यवस्था।
  • नए जिले और प्रशासनिक पहुंच।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों का विस्तार।
  • गरीबी और बुनियादी अभावों में कमी के संकेत।

लेकिन कुछ चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं:

  • युवाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार।
  • आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में विकास का असमान स्तर।
  • कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी।
  • सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता।
  • खनिज संपदा के लाभ का समान वितरण।
  • किसानों की आय और कृषि विविधीकरण।
  • पर्यावरण संरक्षण और विस्थापन का सवाल।
  • बढ़ती वित्तीय जिम्मेदारियां।

10. अगले 25 वर्षों का छत्तीसगढ़ कैसा होना चाहिए?

छत्तीसगढ़ अब केवल खनिज और धान के उत्पादन के आधार पर अपनी पहचान नहीं बना सकता। आने वाले समय में राज्य को ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें उद्योगों के साथ स्थानीय रोजगार, कृषि के साथ खाद्य प्रसंस्करण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व मिले।

बस्तर और सरगुजा में पर्यटन, वन आधारित उद्योग, लघु वनोपज का प्रसंस्करण और स्थानीय युवाओं के लिए कौशल विकास रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जैसे शहरों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आईटी और सेवा क्षेत्र के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर काम करना होगा।

साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास का लाभ केवल बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित न रहे।

निष्कर्ष: 26 साल बाद भी एक सवाल बाकी है…

1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना था, तब लोगों ने एक ऐसे प्रदेश का सपना देखा था, जहां संसाधनों की कमी नहीं बल्कि अवसरों की कमी भी न हो।

आज राज्य ने अपनी पहचान बनाई है। अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है, उद्योगों का विस्तार हुआ है और बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है।

लेकिन विकास की असली तस्वीर रायपुर की चौड़ी सड़कों, बड़े भवनों और औद्योगिक परियोजनाओं से पूरी नहीं होती।

उसकी असली तस्वीर तब दिखाई देगी, जब अबूझमाड़ के बच्चे को भी रायपुर जैसी शिक्षा मिलेगी, बस्तर के मरीज को समय पर इलाज मिलेगा, किसान अपनी उपज से सम्मानजनक आय कमा सकेगा और स्थानीय युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर नहीं होगा।

छत्तीसगढ़ ने 26 वर्षों में अपनी पहचान और विकास की नींव जरूर मजबूत की है, लेकिन अब चुनौती विकास की गति से ज्यादा उसके समान वितरण की है।

क्योंकि अलग राज्य बनने का सपना केवल छत्तीसगढ़ का नक्शा बदलना नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ के आम आदमी की जिंदगी बदलना था। यही सपना अभी पूरी तरह साकार होना बाकी है।


संपादकीय तथ्य नोट: इस विश्लेषण में अलग-अलग वर्षों के आधिकारिक सर्वेक्षण और बजट आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। जहां पुराने आंकड़े हैं, वहां उनका वर्ष स्पष्ट किया गया है।


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