दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘परमिशन राज’ के खिलाफ छात्र, कॉलेजों में बदल रही है राजनीति

दिल्ली विश्वविद्यालय में 'परमिशन राज' के खिलाफ छात्र, कॉलेजों में बदल रही है राजनीति

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ सालों से छात्र संगठनों की गतिविधियां सीमित करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं. जेएनयू और जेएमआई के बाद अब डीयू प्रशासन ने भी नए दिशानिर्देश जारी किए हैं.दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) उच्च शैक्षिक संस्थान होने के साथ ही बहस, असहमति और राजनीतिक चेतना का मंच रहा है. आर्ट्स फैकल्टी, चाय की दुकानों के कोने और पोस्टरों से भरी दीवारें इसकी पहचान है. यहां छात्र राजनीति से अरुण जेटली, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, विजय गोयल और अजय माकन जैसे कई बड़े नेता निकले. वही विश्वविद्यालय परिसर अब बदल रहा है.

फरवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान यूट्यूबर रुचि तिवारी के साथ कथित तौर पर बदसलूकी हुई. इसके बाद डीयू प्रशासन ने छात्र सभाओं पर प्रतिबंध की घोषणा की. दिल्ली हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने पुराने फैसले में बदलाव किया.

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24 मार्च को डीयू ने एक नोटिफिकेशन जारी कर नए दिशानिर्देश बताए. इसके मुताबिक कैंपस में किसी भी तरह का प्रोटेस्ट, सभा, मार्च, रैली या कार्यक्रम के लिए 72 घंटे पहले अनुमति लेना जरूरी है. इसके लिए आयोजकों को स्थानीय पुलिस और प्रॉक्टर को लिखित आवेदन देना होगा.

बिना अनुमति किसी भी आयोजन पर निलंबन या अन्य कार्रवाई हो सकती है. साथ ही, बाहरी लोगों के शामिल होने पर भी रोक लगाई गई है. छात्र संगठन इस नोटिफिकेशन को कैंपस की लोकतांत्रिक संस्कृति पर सीधा प्रहार बता रहे हैं.

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स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के संयुक्त सचिव अमन, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी कर रहे हैं. नए नियमों को वह एक पैटर्न का हिस्सा मानते हैं. अमन बताते हैं कि पहले, प्रदर्शन करने से पूर्व वह केवल मौरिस नगर पुलिस स्टेशन को सूचित करते थे. उनके मुताबिक कई ऐसे उदाहरण हैं जहां प्रदर्शन बीच में रोका गया, छात्रों पर हमले हुए और खासकर छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा होती रही है.

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नए नोटिफिकेशन के अनुसार अब सूचना देने की बजाय अनुमति लेनी पड़ेगी. अमन का आरोप है कि कोविड महामारी के बाद कॉलेज खुलने के साथ ही प्रशासन की सख्ती बढ़ गई. विरोध करने वाले छात्रों को निलंबित या निष्कासित किया जाने लगा है. वह कहते हैं, “छात्रों में डर बिठाया जा रहा है. कंपलसरी अटेंडेंस, एक्सट्रा क्लासेज और लंबे लेक्चर्स के माध्यम से छात्रों को जानबूझकर कक्षाओं में व्यस्त रखा जाता है, ताकि वे प्रदर्शन में शामिल होने न जाएं.”

‘पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं’

इस साल 12 फरवरी को इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट्स फैकल्टी के बाहर हमला हुआ. यह कार्यक्रम ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने आयोजित किया था. आईसा (डीयू) अध्यक्ष सावी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में पक्षपात का आरोप लगाया, “हम देख रहे हैं कि ये पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को लगभग हर आयोजन के लिए अनुमति मिल जाती है. कल ही मैंने एक पोस्टर देखा, जिसमें वे नॉर्थ कैंपस के गर्ल्स हॉस्टल में आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित कर रहा है. कुलपति (वीसी) मुख्य अतिथि हैं. हमें अक्सर साधारण स्टडी सर्कल करने की भी इजाजत नहीं मिलती. यह सत्ता का दुरुपयोग है.”

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सावी आगे बताती हैं, “पहले हम आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद स्टैचू के सामने प्रदर्शन करते थे. कोविड के बाद यह जगह सीमित कर दी गई. अब केवल गेट नंबर 4 पर ही प्रदर्शन की अनुमति है. जबकि आरएसएस आर्ट्स फैकल्टी के अंदर शाखा लगाता है. हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अगर एक विचारधारा को अपनी बात रखने की आजादी दी जा रही है, तो हमें भी वही अधिकार मिलना चाहिए.”

भगत सिंह की विचारधारा से प्रेरित ‘दिशा छात्र संगठन’ डीयू में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. नए नोटिफिकेशन के बावजूद 27 मार्च को उन्होंने ‘शहीद दिवस’ के अवसर पर एक सभा बुलाई, जिसे पुलिस ने बीच में रोक दिया. संगठन का आरोप है कि संबंधित नोटिफिकेशन इसलिए लाया गया ताकि छात्र, प्रशासन के खिलाफ आवाज न उठा सकें, फिर चाहे प्रशासन कोई भी गलत काम क्यों न कर रहा हो.

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‘दिशा छात्र संगठन’ के सदस्य योगेश मीणा लॉ फैकल्टी में पढ़ाई करते हैं. वह कहते हैं, “दूसरी ओर प्रशासन फीस में बढोतरी जैसे किसी भी फैसले पर छात्रों से कोई राय नहीं लेता. फैसला सीधे उनके ऊपर थोप दिया जाता है. हमें अपने ही कैंपस में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.”

अनुशासन बनाए रखना जरुरी

वैचारिक रूप से आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन ‘एबीवीपी’ के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि उनका संगठन डीयू प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ है और छात्रों के साथ खड़ा है.

वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के छात्र संगठन ‘एनएसयूआई’ के सदस्य और पूर्व डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री कहते हैं, “शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को सीमित करने वाला कोई भी कदम खतरनाक है. लेकिन, कैंपस में व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है. इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो अनुशासन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दोनों को बनाए रखे.”

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डीयू के प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह का तर्क है कि वे विरोध प्रदर्शन नहीं रोक रहे हैं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित किया जा रहा है. वर्तमान में डूसू की संयुक्त सचिव दीपिका झा ने डीडब्ल्यू से कहा, “हम इस फैसले में डीयू प्रशासन के साथ हैं, क्योंकि कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है.”

अन्य विश्वविद्यालयों में भी प्रदर्शन पर पाबंदियां

सौरभ जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) के हिंदी विभाग से पीएचडी कर रहे हैं और आईसा से जुड़े हैं. बीते साल अक्टूबर में जारी एक नोटिस में बताया गया कि प्रशासनिक ब्लॉक के 100 मीटर के दायरे में छात्रों को प्रदर्शन करने नहीं दिया जाएगा. प्रदर्शन के लिए विश्वविद्यालय ने गेट नंबर 18 के भीतर एक स्थान तय किया है. कैंपस में दीवारों पर ग्रैफिटी बनाने पर जुर्माना भी लगाया जाएगा.

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सौरभ बताते हैं कि गेट नंबर 18 मेट्रो स्टेशन के पास है. यह इतना संकरा है कि 20–25 लोगों का खड़े होना भी मुश्किल है. वह कहते हैं, “नई गाइडलाइंस के अनुसार, प्रदर्शन करने के लिए डीन या एचओडी की सिफारिश के साथ प्रॉक्टर ऑफिस में प्रो-फॉर्मा भरकर जमा करना होता है. प्रदर्शन के लिए दोपहर 2 बजे से शाम 5:30 बजे के बीच केवल दो घंटे का समय दिया जाता है. कई बार प्रशासन मनमाने कारण देकर अनुमति देने से इनकार कर देता है.”

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निजी कंपनी द्वारा नियुक्त सिक्यॉरिटी गार्डों पर भी छात्रों को शिकायत है. एमए की छात्रा सादिया हसन बताती हैं, “इन नियमों से सामान्य छात्रों को परेशानी हो रही है. हम 10 लोग भी कैंपस के गार्डन में बैठकर कुछ पढ़ रहे हों, तो गार्ड आकर सवाल-जवाब करने लगते हैं. हमें जबरदस्ती उठा दिया जाता है.”

100 मीटर के दायरे में प्रदर्शन प्रतिबंधित

कुछ इसी तरह के नियम जेएनयू में भी हैं. अकादमिक इमारतों के 100 मीटर के भीतर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं है. जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और आईसा कार्यकर्ता धनंजय का कहना है कि यूनिवर्सिटी को ‘एंटी-नेशनल’ बोलकर 2016 से लगातार बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. धनंजय के मुताबिक, छात्रों के बीच डर है कि उनपर कभी भी कार्रवाई की जा सकती है.

वह बताते हैं, “हमारी पढ़ाई करदाताओं के पैसों से होती है. ऐसे में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर हम देश की आवाज को उठाते हैं. विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में किताबों की कमी है. बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. दीवारों की हालत भी खराब है. इन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय प्रशासन ने हाल ही में लाइब्रेरी के प्रवेश द्वार पर फेशियल रेकग्निशन मशीन लगा दी. हमारी जरूरतें कुछ और हैं, लेकिन खर्च किसी और पर किया जा रहा है.”

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प्रॉक्टर मैनुअल में लिखा है कोई भी पोस्टर या पैंफलेट, जिसमें कथित रूप से आपत्तिजनक धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातिगत या ‘एंटी-नेशनल’ टिप्पणी हो, प्रतिबंधित है. इनपर धनंजय कहते हैं, “ये नियम इतने अस्पष्ट हैं कि तय करना मुश्किल है ‘एंटी-नेशनल’ क्या है और क्या नहीं. जब हमने जाति-आधारित भेदभाव को रोकने वाले यूजीसी के नए नियमों के लिए मार्च किया, तो छात्रों को एंट्री गेट पर ही रोक लिया और पुलिस बसों में बैठा दिया. जिसके बाद से जेएनयूएसयू के चारों ऑफिस बियरर्स रस्टिकेट हैं.”

मयंक पांचाल एबीवीपी जेएनयू यूनिट अध्यक्ष हैं. वह बताते हैं कि विरोध किसी विशेष मुद्दे को लेकर ही किया जाता है, ऐसे में प्रशासन को यह समझना चाहिए कि वे छात्रों की समस्याओं का समाधान देने के लिए है. मयंक ने कहा, “प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद की कमी नहीं होनी चाहिए. जेएनयू में आमतौर पर मीटिंग और कॉन्फ्रेंस आयोजित करने में इतनी परेशानी नहीं होती. पिछले साल हमने स्मृति ईरानी को आमंत्रित किया था, लेकिन उन्हें सुनने के बजाय वामपंथी संगठनों ने कार्यक्रम में बाधा डाली. इस तरह के विरोध की अनुमति नहीं होनी चाहिए.”

प्रदर्शन संबंधी नियमों पर एकमत नहीं हैं प्रोफेसर

डीयू के मिरांडा हॉउस में वरिष्ठ प्रोफेसर आभा देव हबीब का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य समाधान खोजना है, इसके लिए सवाल पूछना जरूरी है. छात्रों ने किसान और मजदूर आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है. आज ट्रांस बिल के खिलाफ भी छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं.

उन्होंने आरोप लगाया, “हम केवल दक्षिणपंथी सेमिनार और शिक्षकों को ही बढ़ावा दिए जाते हुए देख रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि समाधान विरोध को रोकने में है. बल्कि इस बात में है कि सरकार इन विरोधों पर कैसी प्रतिक्रिया देती है. कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है. प्रदर्शन पर रोक लगाना कोई तरीका या बहाना नहीं हो सकता.”

वहीं स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में राजनीति विभाग में सहायक प्रोफेयर शिखा मानती हैं, “खासकर, छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा देखने को मिलती है. कई बार बाहरी लोग कैंपस में आकर कक्षाओं में घुस जाते हैं और पढ़ाई में बाधा डालते हैं. इस पर नियंत्रण जरूरी था. विरोध प्रदर्शन होने चाहिए, लेकिन उन्हें करने के और भी तरीके हो सकते हैं.”




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