म्यांमार सुपारी तस्करी नेटवर्क पर ईडी का एक्शन, चम्फाई में 9 ठिकानों पर छापेमारी

Myanmar म्यांमार: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने म्यांमार से सुपारी की तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में मिजोरम के चम्फाई में 9 जगहों पर छापेमारी की। इस मामले में अपराध से अर्जित 970 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम शामिल है। दरअसल, ईडी के आइजोल सब-जोनल ऑफिस ने गुरुवार को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए), 2002 की धारा 17(1) के तहत मिजोरम के चम्फाई में 9 जगहों पर तलाशी अभियान चलाया। ये तलाशी लालरेमपारी, लालनेमी (मालिक, रेम रेम और बेकी स्टोर), सांगनेइवेला (मालिक, एसएनवी स्टोर), थांगखानमुंगा (मालिक, सीएस स्टोर), रोथुआमलुइया (मालिक, एनएस इंटरप्राइजेज), लालरेम्माविया (मालिक, एस एंड आर हार्डवेयर स्टोर), लालदुआ (मालिक, जेएच फैमिली एंटरप्राइज), जोनुनसांगा (मालिक, मामी स्टोर) और जोसांगपुई के रिहायशी और कारोबारी ठिकानों पर की गई।

ईडी ने यह जांच सीबीआई, इंफाल की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की। यह एफआईआर एक बड़े पैमाने पर चल रहे तस्करी रैकेट से जुड़ी है, जिसमें म्यांमार से सूखी सुपारी की अवैध रूप से देश में मिजोरम के चम्फाई के रास्ते तस्करी की जा रही थी। यह एफआईआर गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा पीआईएल संख्या 5/2022 में 16 जुलाई 2024 को जारी निर्देशों के अनुपालन में दर्ज की गई थी। ईडी की जांच से पता चला कि म्यांमार के नागरिकों ने टियू नदी के रास्ते सूखी सुपारी की तस्करी करके उसे भारत में जोखावथार और चंफाई में बिना किसी कस्टम क्लीयरेंस के पहुंचाया और खेप को सीमा पर मौजूद स्थानीय मददगारों को सौंप दिया। इन स्थानीय मददगारों ने तस्करी की गई सुपारी को चंफाई के गोदामों में जमा किया और असम-मिजोरम सीमा पर स्थित वैरेनगटे तक उसके परिवहन का समन्वय किया।

इन ऑपरेशनों के लिए फाइनेंसिंग सिलचर (असम) स्थित व्यापारियों और फाइनेंसरों द्वारा किया गया, जिन्होंने बैंकिंग चैनलों के माध्यम से मिजोरम स्थित मददगारों के खातों में बड़ी रकम भेजी। वहीं, म्यांमार आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान भारतीय मुद्रा में किया गया और बाद में सीमा के पास काम करने वाले मनी एक्सचेंजर के माध्यम से इसे म्यांमार मुद्रा में बदल दिया गया। जांच में आगे यह भी पता चला कि 2021-2024 की अवधि के दौरान चंफाई जिले में सुपारी की आवाजाही के लिए 251.19 करोड़ रुपए (एसजीएसटी) और 86.25 करोड़ रुपए (सीजीएसटी) के ई-वे बिल धोखाधड़ी से जारी किए गए थे। इसके लिए जाली बागान प्रमाण पत्रों और झूठे कस्टम क्लीयरेंस दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, जबकि बागान मालिक जीएसटी के तहत पंजीकृत भी नहीं थे।

मामले को लेकर विभिन्न व्यक्तियों के दर्ज किए गए बयानों से यह स्थापित हुआ कि स्थानीय मददगारों को सुपारी की खरीद, परिवहन, एस्कॉर्टिंग और कस्टम-रिलीज से संबंधित गतिविधियों के लिए प्रति किलोग्राम 2 रुपए से लेकर 15 रुपए तक का कमीशन मिलता था। इस कार्यप्रणाली का एक मुख्य तत्व यह था कि जब्त की गई खेप को अस्थायी रूप से छुड़ाने के लिए कस्टम अधिकारियों के सामने स्थानीय व्यक्तियों को ‘फ्रंट क्लेमेंट’ (सामने से दावा करने वाले) के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसके लिए प्रति जब्ती कस्टम-रिलीज की कार्यवाही के लिए 20 लाख रुपए से लेकर 1 करोड़ रुपए से अधिक तक का भुगतान किया जाता था। कई जब्ती मामलों में तस्करी की गई सुपारी को कानूनी रूप से आयातित माल के रूप में दिखाने के लिए कस्टम अधिकारियों के सामने धोखाधड़ी से ऐसे ‘बिल ऑफ एंट्री’ जमा किए गए, जिनका उस माल से कोई संबंध नहीं था।

आरोपी व्यक्तियों के बैंक खातों के जांच से पता चला कि ‘अपराध से अर्जित आय’ की कुल राशि 970 करोड़ रुपए को वर्ष 2013 से 2025 की अवधि के दौरान कई खातों के माध्यम से भेजा गया। तलाशी अभियान के दौरान, आपत्तिजनक दस्तावेज, जिनमें आरोपी व्यक्तियों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर दर्ज अचल संपत्तियों से संबंधित स्वामित्व विलेख और संपत्ति के दस्तावेज, व्यावसायिक रिकॉर्ड, तथा मोबाइल फोन सहित इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं, जिसे पीएमएलए, 2002 के प्रावधानों के तहत जब्त कर लिया गया।


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