सोमवार को नई शिक्षा नीति पर राज्यपालों के सम्मेलन में जानिए क्या बोले राष्ट्रपति कोविंद और PM मोदी…

नई दिल्ली : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नई शिक्षा नीति पर आयोजित राज्यपालों के सम्मेलन को संबोधित किया. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि शिक्षा नीति की जिम्मेदारी से केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय जुड़े होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि शिक्षा नीति में सरकार का दखल कम से कम होना चाहिए. शिक्षा नीति से जितना शिक्षक, अभिभावक और छात्र-छात्राएं जुड़े होंगे, उसकी प्रासंगिकता उतनी ही रहती है.

 

उन्होंने कहा, नई शिक्षा नीति पर 4-5 साल से कम चल रहा था. लाखों लोगों ने अपने सुझाव दिए थे. इसका ड्राफ्ट जो तैयार हुआ था उसके अलग-अलग पॉइंट पर 2 लाख से अधिक लोगों ने सुझाव दिए थे. इतना गहरा इतना व्यापक, विविधिता के बाद जो अमृत निकला है उसकी वजह से हर ओर इसका स्वागत हो रहा है. सबको राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपनी शिक्षा नीति लग रही है. सभी के मन में यह भावना है कि यही सुधार तो मैं होते हुए देखना चाहता था.

 

पीएम मोदी ने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ पढ़ाई के तौर तरीकों में बदलाव के लिए ही नहीं है. ये 21वीं सदी के भारत के सामाजिक और आर्थिक पक्ष को नई दिशा देने वाली है. ये आत्मनिर्भर भारत के संकल्प और सामर्थ्य को आकार देने वाली है.

 

उन्होंने कहा, आज दुनिया भविष्य में तेजी से बदलते जॉब्स, नेचर ऑफ वर्क को लेकर चर्चा कर रही है. नई शिक्षा नीति देश के युवाओं को भविष्य की आवश्यकताओं के मुताबिक शिक्षा और स्किल्स दोनों मोर्चों पर तैयार करेगी.

 

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का भाषण

 

वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि यह शिक्षा नीति 21वीं सदी की आवश्यकता और आकांक्षाओं के अनुरूप देश को आगे ले जाने में सक्षम होगी. यह कहा जा रहा है कि यदि इस नीति के अनुरुप बदलाव कर लिए जाते हैं तो भारत एक शिक्षा महाशक्ति बन जाएगा.

 

राष्ट्रपति कोविंद ने कहा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, परामर्शों की अभूतपूर्व और लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार की गई है. मुझे बताया गया है कि इस नीति के निर्माण में, ढाई लाख ग्राम पंचायतों, साढ़े बारह हजार से अधिक स्थानीय निकायों तथा लगभग 675 जिलों से प्राप्त दो लाख से अधिक सुझावों को ध्यान में रखा गया है.

 

राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं के अनुरूप देशवासियों को, विशेषकर युवाओं को आगे ले जाने में सक्षम होगी. यह केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत के शिक्षार्थियों एवं नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है.

 

राष्ट्रपति ने कहा कि 1968 की शिक्षा नीति से लेकर इस शिक्षा नीति तक, एक स्वर से निरंतर यह स्पष्ट किया गया है कि केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र में के GDP 6% निवेश का लक्ष्य रखना चाहिए. 2020 की इस शिक्षा नीति में इस लक्ष्य तक शीघ्रता से पहुंचने की अनुशंसा की गई है.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button