भूपिंदर हुड्डा को मिली राहत, अदालत ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट को दी मंजूरी
FIR दर्ज होने के 11 साल बाद, बिना किसी ट्रायल के ही यह मामला खत्म हो गया है।
विशेष जज (CBI) विजयंत सहगल ने अपने फैसले में कहा कि जांच में ऐसा कोई “पर्याप्त सबूत” नहीं मिला है, जो कथित साजिश, धोखाधड़ी, गलत नीयत से लिए गए फैसले, सरकार को हुए नुकसान या किसी को अनुचित आर्थिक लाभ मिलने की बात को साबित कर सके। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र रूप से विचार करने पर, उन्हें जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असहमत होने का कोई आधार नहीं मिला। यह मामला हरियाणा सरकार की एक शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें केंद्र से CBI जांच की मांग की गई थी। इस मामले को पूर्व IAS अधिकारी अशोक खेमका ने सामने रखा था। CBI ने 21 अगस्त 2015 को राज्य कृषि विभाग के अज्ञात लोगों और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की थी। इसमें IPC की धारा 120-B (आपराधिक साजिश) और धारा 420 (धोखाधड़ी), तथा ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988’ की धारा 13(2) और 13(1)(d) के तहत आरोप लगाए गए थे।
CBI ने आरोपों के छह बिंदुओं की जांच की:
अक्टूबर 2010 में, ‘बेयर क्रॉप साइंस इंडिया’ (Bayer Crop Science India) द्वारा बनाए गए ‘रैक्सिल 2% DS’ (Raxil 2% DS) को बीज डीलरों और किसानों के लिए अनिवार्य कर दिया गया था। आरोप है कि ऐसा ‘हरियाणा राज्य बीज प्रमाणन एजेंसी’ (Haryana State Seed Certification Agency) के प्रमाणीकरण के बिना किया गया, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान होने और पर्यावरण तथा स्वास्थ्य को खतरा पहुंचने की आशंका थी। यह भी आरोप लगाया गया कि यह फैसला राज्य के कुछ कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों की एक संदिग्ध सिफारिश पर लिया गया था, और 6 अक्टूबर 2010 को हुई उस बैठक में कोई औपचारिक एजेंडा नोट भी नहीं था।
साथ ही यह भी कहा गया कि सारा सामान हिसार/करनाल की ‘विशाल ट्रेडिंग कंपनी’ (Vishal Trading Company) से ही मंगाया गया था, और वह भी बहुत अधिक दरों पर, जिसका भुगतान सरकारी फंड से किया गया। इसमें से आधी रकम केंद्र की ‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना’ से आई थी। आरोप है कि किसानों को इशारों-इशारों में यह बताया गया था कि 100% सब्सिडी पाने के लिए उन्हें केवल उसी डीलर से खरीदारी करनी होगी।
आरोप है कि बायर (Bayer) ने तीन राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के पादप रोग विशेषज्ञों (plant pathologists) को यह दावा करने के लिए प्रभावित किया कि ‘रैक्सिल’ (Raxil) ‘करनाल बंट’ (Karnal bunt) बीमारी के खिलाफ असरदार है। वैज्ञानिक समुदाय के एक बड़े हिस्से ने इस दावे को नहीं माना। कंपनी ने अखबारों में विज्ञापन देकर इस दावे का प्रचार भी किया, लेकिन बाद में इससे इनकार कर दिया कि उसने ऐसे विज्ञापन जारी किए थे। आरोप है कि ‘स्टेट हाई पावर्ड परचेज कमिटी’ (State High Powered Purchase Committee) के सदस्यों ने एक शर्त हटा दी थी, जिसके तहत बायर को ‘हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन’ (HSDC) के 29 मार्च, 2013 के सप्लाई ऑर्डर में अपना ‘बेस्ट डीलर रेट’ (सबसे कम डीलर दर) देना अनिवार्य था।
CBI का निष्कर्ष
CBI ने कहा कि उसे हरियाणा सरकार के अधिकारियों के बीच किसी आपराधिक साजिश का कोई सबूत नहीं मिला। एजेंसी के अनुसार, यह फैसला ‘हाई पावर परचेज कमिटी’ में लिया गया था और कई बैठकों में चर्चा के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री हुड्डा ने इसे मंजूरी दी थी; यह किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं था। 6 अक्टूबर, 2010 को हुई वह बैठक, जिसमें 100% सब्सिडी पाने के लिए ‘रैक्सिल’ की खरीद अनिवार्य कर दी गई थी, हुड्डा की अध्यक्षता में ही हुई थी।
वैज्ञानिक पहलुओं पर, एजेंसी ने बताया कि बायर ने 1999 में ‘सेंट्रल इंसेक्टिसाइड्स बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमिटी’ (CIB&RC) के पास आवेदन किया था और हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय को टेस्टिंग फीस का भुगतान किया था। वैज्ञानिकों ने 1999 से 2001 तक इस उत्पाद का परीक्षण किया। 2003 में प्रकाशित ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ (खेती के तरीकों की नियमावली) में ‘लूज स्मट’, ‘फ्लैग स्मट’ और ‘करनाल बंट’ जैसी बीमारियों के लिए ‘रैक्सिल’ के इस्तेमाल की सिफारिश की गई थी। यह सिफारिश 100% सीड ट्रीटमेंट (बीज उपचार) नीति लागू होने से पहले ही आ गई थी।
CIB&RC ने 19 फरवरी, 2007 को ही 40 ग्राम के पाउच की पैकेजिंग को मंजूरी दे दी थी, जो 2010 की बैठक से काफी पहले की बात है।
कीमत के मामले में, CBI ने कहा कि ‘पंजाब स्टेट सीड कॉरपोरेशन’ और ‘नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन’ ने भी ‘रैक्सिल’ को उसी दर पर खरीदा था जिस दर पर HSDC ने बायर को भुगतान किया था। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि कीमत बहुत ज्यादा (बढ़ा-चढ़ाकर) रखी गई थी। एजेंसी को ऐसा कोई मौखिक या दस्तावेजी सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि किसी अधिकारी को कोई आर्थिक लाभ हुआ हो, इसलिए भ्रष्टाचार का आरोप साबित नहीं हो सका। यह भी साबित नहीं हो सका कि आदेश (मैन्डेट) के पास प्रमाणन नहीं था, बिना एजेंडे के हुई बैठक से सरकारी खजाने को नुकसान हुआ या नियमों का उल्लंघन हुआ, या फिर ‘बेस्ट डीलर रेट’ की शर्त को गलत तरीके से हटाया गया था।
सरकार को कोई आपत्ति नहीं
क्लोजर रिपोर्ट का नोटिस शिकायतकर्ता मदन लाल को भेजा गया, जो उस समय विजिलेंस विभाग में उप-सचिव थे। वे 15 दिसंबर, 2025 को पेश हुए, उन्होंने रिपोर्ट और दस्तावेजों वाली पेन-ड्राइव मिलने की पुष्टि की और कहा कि वे इसे विभाग को सौंप देंगे, क्योंकि वे अब रिटायर हो चुके हैं। 21 मई, 2026 को विजिलेंस-II शाखा के अधीक्षक सहदेव एक अथॉरिटी लेटर के साथ पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार CBI की सिफारिश से सहमत है और उसे इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने संयुक्त सचिव सोनू राम का 20 मई, 2026 का एक पत्र भी पेश किया।
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