बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना पर चीन की नजर, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

नई दिल्ली: बांग्लादेश की सबसे महत्वपूर्ण नदी परियोजनाओं में शामिल तीस्ता नदी परियोजना एक बार फिर भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने बांग्लादेश को तीस्ता नदी के पुनर्विकास और प्रबंधन के लिए लगभग 9 हजार करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब भारत भी लंबे समय से इस परियोजना में सहयोग की इच्छा जता चुका है।

क्या है तीस्ता नदी परियोजना?

तीस्ता नदी का उद्गम सिक्किम के हिमालयी क्षेत्र से होता है और यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी की कुल लंबाई लगभग 414 किलोमीटर है। यह बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में सिंचाई, पेयजल और कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का समझौता प्रस्तावित हुआ था, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियों के कारण यह समझौता अब तक लागू नहीं हो सका। इसके चलते बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के पुनर्विकास और जल प्रबंधन के लिए वैकल्पिक सहयोगी की तलाश कर रहा है।

चीन का बड़ा प्रस्ताव

रिपोर्टों के मुताबिक चीन ने बांग्लादेश को लगभग 9 हजार करोड़ रुपये की लागत से तीस्ता नदी परियोजना विकसित करने का प्रस्ताव दिया है। इस योजना में नदी की ड्रेजिंग, तटबंधों का निर्माण, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना और नदी किनारे आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है।

बताया जा रहा है कि इससे पहले भारत ने भी इस परियोजना में सहयोग की इच्छा जताई थी, लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब चीन की सक्रियता ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है।

भारत के लिए क्यों अहम है तीस्ता?

तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के सिक्किम और पश्चिम बंगाल के कई हिस्से इस नदी पर निर्भर हैं। वहीं बांग्लादेश में यह नदी लाखों किसानों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है।

यदि चीन इस परियोजना में बड़ी भूमिका निभाता है, तो भारत की पूर्वोत्तर सीमा के निकट उसका प्रभाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों पर भी असर पड़ सकता है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर के कारण बढ़ी चिंता

तीस्ता परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट होना है। यह कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला मात्र लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा रणनीतिक गलियारा है।

यदि चीन की मौजूदगी इस क्षेत्र के आसपास बढ़ती है, तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है। यही वजह है कि इस परियोजना को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बांग्लादेश की बदलती रणनीति

हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने चीन के साथ आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाया है। दूसरी ओर भारत भी बांग्लादेश के साथ अपने संबंध मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। ऐसे में तीस्ता परियोजना दोनों एशियाई शक्तियों के बीच प्रभाव बढ़ाने की नई प्रतिस्पर्धा बनती दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों की राय

रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि चीन को यह परियोजना मिलती है, तो वह बांग्लादेश में अपनी आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ और मजबूत कर सकता है। वहीं भारत के लिए यह आवश्यक होगा कि वह बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे, सीमा सुरक्षा और विकास सहयोग के मुद्दों पर तेजी से आगे बढ़े, ताकि दोनों देशों के संबंध और मजबूत हो सकें।

निष्कर्ष

तीस्ता नदी परियोजना अब केवल एक नदी विकास योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का अहम मुद्दा बन चुकी है। चीन के निवेश प्रस्ताव और भारत की रणनीतिक चिंताओं के बीच आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश इस परियोजना को किस दिशा में आगे बढ़ाता है। भारत के लिए भी यह अवसर होगा कि वह अपने पड़ोसी देश के साथ विश्वास और सहयोग को और मजबूत करे।


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