इस्लामिक NATO’ को मिलेगी नई ताकत, अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेना वाला देश जुड़ने को तैयार

मिस्र की एंट्री पर बढ़ी चर्चा
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअती ने कहा है कि काहिरा इस समझौते में शामिल होने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रक्षा संबंधी जिम्मेदारियों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा अभी बाकी है। तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी मिस्र को इस क्षेत्र का स्वाभाविक साझेदार बताया है। उन्होंने कहा कि कुछ तकनीकी मुद्दों के समाधान के बाद मिस्र के शामिल होने की संभावना बढ़ सकती है। विश्लेषकों के अनुसार, मिस्र के जुड़ने से यह गठबंधन केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वी भूमध्य सागर, लाल सागर, फारस की खाड़ी और दक्षिण एशिया तक इसका प्रभाव बढ़ सकता है।
पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका
इस उभरते गठबंधन में पाकिस्तान की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पाकिस्तान इस समूह का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है, जिसके कारण उसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी उसे खास बनाती है। यह दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और रक्षा अनुभव इस गठबंधन को मजबूती दे सकते हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से ही सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था मौजूद है। नया समझौता इसी रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में देखा जा रहा है।
भारत के खिलाफ नहीं बताया गया गठबंधन
हालांकि इस समझौते को लेकर कुछ चर्चाएं भारत के संदर्भ में भी हो रही हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर इसे भारत विरोधी गठबंधन नहीं बताया गया है। इसके समर्थक इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग बढ़ाने की पहल के रूप में पेश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गठबंधन अमेरिका के नेतृत्व वाली पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था से अलग एक क्षेत्रीय और बहुध्रुवीय सुरक्षा मॉडल की ओर संकेत कर सकता है। वहीं, कुछ रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के गठबंधन से पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका बढ़ सकती है, लेकिन इससे उसे मध्य पूर्व के जटिल संघर्षों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का जोखिम भी उठाना पड़ सकता है। यदि मिस्र इस समझौते में शामिल होता है तो मक्का रक्षा समझौता एक बड़े सुरक्षा गठबंधन के रूप में उभर सकता है, जिसका असर आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर देखने को मिल सकता है।
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