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हत्या मामले में तीसरी बार रद्द हुई जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को लगाई फटकार

New Delhi. नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और दंगा जैसे गंभीर अपराधों में जमानत देते समय लापरवाह रवैया अपनाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी आलोचना की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि “जेलों में 5-6 गुना भीड़भाड़” जैसी परिस्थितियां ऐसे मामलों में जमानत का आधार नहीं हो सकतीं, खासकर जब आरोपी पर संगीन धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा हो और उसके खिलाफ पहले भी गवाहों को धमकाने और आपराधिक पृष्ठभूमि के आरोप हों। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 3 जून 2025 के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी की जमानत तीसरी बार निरस्त कर दी। अदालत ने आरोपी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया और स्पष्ट कर दिया कि वह मुकदमे की समाप्ति तक हिरासत में रहेगा।
मामले की पृष्ठभूमि: तीन बार जमानत, तीन बार रद्द
यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149, 352, 302, 307, 504 और 34 के तहत दर्ज गंभीर आरोपों से जुड़ा है, जिसमें हत्या, हत्या का प्रयास, दंगा और आपराधिक धमकी जैसे अपराध शामिल हैं।
पहली बार जमानत: 22 अगस्त 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दी थी।
पहला रद्द आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2022 को इसे रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट वापस भेज दिया।
दूसरी बार जमानत: 7 दिसंबर 2022 को हाईकोर्ट ने पुनः जमानत दी।
दूसरा रद्द आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई 2024 को यह जमानत भी निरस्त कर दी और कहा— “यदि कोई नई परिस्थिति उत्पन्न होती है, तो प्रतिवादी बाद में जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।”
तीसरी बार जमानत: ट्रायल कोर्ट ने 20 जनवरी 2025 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी, लेकिन हाईकोर्ट ने जून 2025 में फिर जमानत दे दी।
वर्तमान आदेश: 14 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने तीसरी बार जमानत रद्द कर दी।
अपीलकर्ता के तर्क: ‘नई परिस्थिति’ का गलत अर्थ
पीड़ित पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के 17 मई 2024 के आदेश में ‘नई परिस्थिति’ का मतलब केवल वे हालात हैं जो उस तारीख के बाद उत्पन्न हुए हों।
हिरासत की लंबी अवधि या सह-आरोपियों को मिली जमानत कोई नई परिस्थिति नहीं है, क्योंकि ये कारण पहले भी मौजूद थे।
आरोपी का आपराधिक इतिहास है और उसने पहले गवाहों को धमकाया है, जिससे मुकदमे की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
प्रतिवादी के तर्क: ‘दुरुपयोग का कोई सबूत नहीं’
आरोपी की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा कि जमानत तभी रद्द की जानी चाहिए जब उसका दुरुपयोग हुआ हो, जो इस मामले में नहीं हुआ।
आरोपी ने न तो मुकदमे में कोई बाधा डाली और न ही किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल हुआ।
सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर उसे भी राहत मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने आदेश की ‘आत्मा’ का पालन नहीं किया
पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 17 मई 2024 के आदेश का सही और संपूर्ण पालन नहीं किया।
‘नई परिस्थिति’ की शर्त को नजरअंदाज कर आरोपी को जमानत दी गई।
“पुलिस की एकतरफा जांच” या “आरोपी पक्ष की अनदेखी” जैसी टिप्पणियां जमानत पर विचार करते समय प्रासंगिक नहीं थीं।
‘जेलों की भीड़भाड़’ को गंभीर अपराधों में राहत का आधार बनाना पूरी तरह अनुचित है।
अदालत ने कहा:
“संविधान की रूपरेखा यह अनिवार्य करती है कि इस न्यायालय के सभी आदेशों/निर्णयों का पालन अन्य सभी न्यायालयों, जिसमें उच्च न्यायालय भी शामिल हैं, अक्षरशः और भावार्थ दोनों रूप में किया जाए।”
जेल की भीड़भाड़ पर अदालत की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जेलों में भीड़भाड़ का मुद्दा न्याय प्रणाली में एक बड़ी समस्या है, लेकिन यह गंभीर अपराधों के आरोपियों को राहत देने का स्वतः आधार नहीं हो सकता।
“आरोपित अपराध की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट के लिए ‘जेलों में 5-6 गुना भीड़भाड़’ को जमानत का आधार बनाना उचित नहीं था।”
आगे की कार्यवाही और निर्देश
आरोपी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा।
ट्रायल कोर्ट को मामले को प्राथमिकता से सुनकर जल्द निपटाने का निर्देश दिया गया।
मुकदमे की समाप्ति तक आरोपी हिरासत में रहेगा।
हालांकि, यदि मुकदमा बिना आरोपी की गलती के विलंबित होता है, तो उसे सीधे सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल करने का अधिकार रहेगा।
मामले से जुड़े प्रमुख कानूनी बिंदु
जमानत रद्द करने के आधार: केवल हिरासत की लंबी अवधि या सह-आरोपियों को मिली जमानत पर्याप्त कारण नहीं, खासकर तब जब शीर्ष अदालत ने ‘नई परिस्थिति’ की शर्त रखी हो।
आदेशों का पालन: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अनुशासन पर जोर देते हुए कहा कि निचली अदालतों को शीर्ष अदालत के आदेशों का अक्षरशः पालन करना अनिवार्य है।
जेल की भीड़भाड़: यह एक सामान्य सामाजिक समस्या है, लेकिन हत्या जैसे अपराधों में यह स्वतः राहत का आधार नहीं बन सकता।




