रायपुर फैशन शो विवाद: सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर लाने का आरोप, पूर्व माओवादी महिलाओं ने कहा- धोखे से कराया रैंप वॉक

रायपुर। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित फैशन शो अब एक नए विवाद के कारण चर्चा में है। कार्यक्रम में सुकमा की आत्मसमर्पित पूर्व माओवादी महिलाओं ने पारंपरिक कोसा सिल्क और हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक किया था। सरकार और समर्थक इसे हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट रही महिलाओं के आत्मविश्वास और पुनर्वास की तस्वीर बता रहे थे। लेकिन अब रैंप वॉक में शामिल कुछ पूर्व माओवादी महिलाओं ने दावा किया है कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर सुकमा से रायपुर लाया गया और बाद में रैंप वॉक कराया गया।

7 अगस्त को हुआ था कार्यक्रम

रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन और स्वदेशी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य छत्तीसगढ़ के हथकरघा, खादी, कोसा सिल्क और पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देना था।

इसी कार्यक्रम में फैशन शो आयोजित किया गया, जिसमें सुकमा की आत्मसमर्पित पूर्व माओवादी महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में रैंप वॉक की। कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी कार्यक्रम की तस्वीरें साझा करते हुए इसे बस्तर में बदलाव और मुख्यधारा में लौटने का प्रतीक बताया था। उनके संदेश के मुताबिक, जिन हाथों में कभी हथियार थे, वे अब सम्मान, आत्मविश्वास और उम्मीद की नई कहानी बुन रहे हैं।

रैंप वॉक करने वाली महिलाएं कौन थीं?

रिपोर्ट के मुताबिक सुकमा से कुल 10 महिलाएं रायपुर लाई गई थीं। इनमें 9 महिलाएं पूर्व माओवादी थीं, जिन्होंने पिछले एक साल के दौरान अलग-अलग समय पर छत्तीसगढ़ और तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था। ये महिलाएं सुकमा स्थित पुलिस संचालित पुनर्वास केंद्र में रह रही थीं।

उनके साथ दो पुलिसकर्मी भी थीं, जिनमें से एक ने रैंप वॉक में हिस्सा लिया था।

पूर्व माओवादी महिलाओं का क्या है आरोप?

रैंप वॉक में शामिल चार पूर्व माओवादी महिलाओं ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उन्हें फैशन शो के लिए नहीं, बल्कि सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर रायपुर लाया गया था।

महिलाओं के मुताबिक, उन्हें बताया गया था कि उन्हें जगदलपुर में सिलाई की ट्रेनिंग दिलाई जाएगी। लेकिन 1 अगस्त की शाम उनका समूह रायपुर पहुंचा। इसके बाद उन्हें होटल में ठहराया गया और 2 से 6 अगस्त तक रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी गई।

महिलाओं का कहना है कि मुंबई से आए कुछ लोगों ने उन्हें रैंप पर चलने का प्रशिक्षण दिया। उनका दावा है कि उन्हें पहले रैंप वॉक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और वे यह समझ नहीं पा रही थीं कि सिलाई प्रशिक्षण की जगह उन्हें कैटवॉक की तैयारी क्यों कराई जा रही है।

एक महिला ने कहा कि अगर उसे पहले से पता होता कि उसे फैशन शो में हिस्सा लेना है तो वह रायपुर जाने से ही मना कर देती।

दूसरी महिला ने भी इसी तरह कहा कि यदि उन्हें फैशन शो में शामिल होने की बात पहले बताई जाती तो वे जाने से इनकार कर देतीं, क्योंकि वे सिलाई का काम सीखने की उम्मीद से गई थीं।

महिला पुलिसकर्मी ने भी दी अलग जानकारी

इस मामले में सुकमा पुनर्वास केंद्र में काम करने वाली महिला पुलिसकर्मी सीमा पोयाम का बयान भी सामने आया है। वह इन महिलाओं को सुकमा से रायपुर लेकर गई थीं और कार्यक्रम के बाद वापस भी लेकर आईं।

रिपोर्ट के अनुसार सीमा पोयाम ने भी पुष्टि की कि महिलाओं को पहले से रैंप वॉक के बारे में जानकारी नहीं थी। उन्हें बताया गया था कि महिलाओं को सिलाई से संबंधित प्रशिक्षण के लिए ले जाया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें खुद भी पहले से यह जानकारी नहीं थी कि रायपुर में महिलाओं से रैंप वॉक कराई जाएगी।

महिलाओं का दावा- एक पैसा नहीं मिला

पूर्व माओवादी महिलाओं ने कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बदले किसी तरह का पारिश्रमिक मिलने से भी इनकार किया है।

उनका कहना है कि उन्हें कोई पैसा नहीं दिया गया। उनके मुताबिक उन्हें सिर्फ एक झोला दिया गया, जिसमें एक सूती साड़ी थी। इसके अलावा उन्हें ट्रैक सूट भी दिया गया था। महिलाओं का दावा है कि उनके बैंक खातों में किसी भुगतान की जानकारी नहीं आई है।

अधिकारी ने कहा- 10-10 हजार रुपये दिए गए

वहीं ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा ने इन दावों से अलग जानकारी दी है।

उन्होंने बताया कि रैंप वॉक में शामिल प्रत्येक महिला को 10 हजार रुपये दिए गए हैं। उनके अनुसार यह राशि नकद नहीं बल्कि महिलाओं के बैंक खातों में भेजी गई। इसके अलावा महिलाओं को हैंडलूम से तैयार खादी और सिल्क के कपड़े भी दिए गए।

यानी इस मामले में भुगतान को लेकर भी दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हैं। महिलाओं का कहना है कि उन्हें पैसा नहीं मिला, जबकि विभागीय अधिकारी का दावा है कि भुगतान बैंक खातों के जरिए किया गया है।

विभाग ने कहा- महिलाओं की सहमति से हुआ कार्यक्रम

ग्रामोद्योग विभाग के अधिकारी राजेश सिंह राणा ने महिलाओं को धोखे से रायपुर लाने के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि पुनर्वास केंद्र में महिलाओं से उनके रोजगार, भविष्य और रुचियों को लेकर चर्चा की गई थी।

उनके अनुसार बातचीत के दौरान कुछ महिलाओं ने रैंप वॉक में रुचि दिखाई थी। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें इसी आधार पर शामिल किया गया।

अधिकारी का कहना है कि रैंप वॉक कार्यक्रम की शुरुआत से ही तय योजना का हिस्सा नहीं था। हथकरघा दिवस के कार्यक्रम में खादी, कोसा सिल्क और सूती कपड़ों को बढ़ावा देने के लिए फैशन शो रखा गया था और बाद में इन महिलाओं के आत्मविश्वास को देखते हुए उन्हें भी इसमें शामिल किया गया।

सहमति पत्र को लेकर भी सवाल

अधिकारी के मुताबिक जिला कलेक्टर की ओर से महिलाओं की कार्यक्रम में भागीदारी को लेकर सहमति पत्र भी भेजे गए थे।

रिपोर्ट में कथित सहमति पत्रों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें स्वदेशी फैशन शो/प्रदर्शनी में भाग लेने की इच्छा से संबंधित नाम, तस्वीर और हस्ताक्षर होने की बात कही गई है।

हालांकि, एक पूर्व माओवादी महिला ने दावा किया कि उसे दस्तावेज में हिंदी में क्या लिखा था, इसकी जानकारी नहीं थी। उसके मुताबिक अधिकारियों ने जहां हस्ताक्षर करने को कहा, वहां उसने हस्ताक्षर कर दिए।

विवाद पर भूपेश बघेल ने सरकार को घेरा

मामला सामने आने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि पूर्व माओवादी महिलाओं को भी कथित तौर पर धोखे में रखा गया और सरकार ने इसका श्रेय लेने की कोशिश की।

उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की।

सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया ने भी उठाए सवाल

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील बेला भाटिया ने भी इस पूरे आयोजन के तरीके पर सवाल उठाया है।

उन्होंने तर्क दिया कि पूर्व माओवादी महिलाओं को सिर्फ रैंप पर उतार देना उनके वास्तविक पुनर्वास और सशक्तिकरण का प्रमाण नहीं हो सकता। उनके अनुसार सरकार को यह देखना चाहिए कि आत्मसमर्पण करने के बाद इन महिलाओं को स्थायी रोजगार, शिक्षा, सामाजिक अधिकार और सम्मानजनक जीवन के लिए क्या अवसर दिए जा रहे हैं।

सरकार के लिए बढ़ी चुनौती

रायपुर का यह कार्यक्रम शुरुआत में बस्तर में बदलाव और आत्मसमर्पित महिलाओं के पुनर्वास की सकारात्मक तस्वीर के रूप में सामने आया था। लेकिन अब पूर्व माओवादी महिलाओं के आरोपों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महिलाओं को रैंप वॉक में शामिल होने की पूरी जानकारी पहले से दी गई थी और क्या उन्होंने स्वतंत्र रूप से इसके लिए सहमति दी थी?

दूसरा सवाल भुगतान को लेकर है। विभाग जहां प्रत्येक महिला को 10 हजार रुपये दिए जाने की बात कह रहा है, वहीं महिलाओं का दावा है कि उनके खातों में कोई रकम नहीं आई।

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में इन आरोपों पर किसी स्वतंत्र प्रशासनिक जांच का अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए महिलाओं के आरोपों को आरोप के रूप में और विभागीय पक्ष को सरकार/अधिकारी के दावे के रूप में देखना उचित होगा।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर रैंप वॉक करने वाली पूर्व माओवादी महिलाओं की तस्वीरों ने जहां बस्तर में बदलाव और पुनर्वास की चर्चा शुरू की थी, वहीं अब उन्हीं महिलाओं के कथित अनुभवों ने पूरे कार्यक्रम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार इसे आत्मविश्वास और मुख्यधारा में वापसी का प्रतीक बता रही है, तो दूसरी तरफ कुछ प्रतिभागी महिलाओं का आरोप है कि उन्हें वास्तविक उद्देश्य बताए बिना रायपुर लाया गया।

अब इस विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि महिलाओं की सहमति, भुगतान और उन्हें रायपुर लाए जाने के वास्तविक उद्देश्य की स्वतंत्र जांच होती है या नहीं।




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